प्रकृति का संदेश



       "सो गया ये जहाँ, सो गया आसमां
    सो गयी है सारी मंजिले , सो गया है रस्ता"
                                                  
हर जगह सनाटा छाया है हर गली और मोहल्ला शांत है|सब कुछ थम सा गया है| ये कैसी वीरानगी है । दूर दूर तक कोई दिखाई नहीं देता । ऐसा क्यों हुआ ? ऐसा हमने क्या किया ? ये कोई दंड है या कोई चेतावनी ? ये सभी विचार मन में आते है । शायद जिंदगी में यह विराम इसलिए लगा है की हम विचार करे की हमने क्या खोया और क्या पाया ? प्रातः उठकर जब अपनी बालकनी में खड़ी होती हुॅ। तो ऐसा प्रतीत होता है की जैसे मैं किसी गांव मैं आ गई हुॅ। जहाँ केवल शांति ही शांति है। चारो तरफ से शुद्ध हवा आ रही है। चिडियो की चहकने की आवाज मोहक लग रही है| शायद इस सकून भरी जिंदगी की ही तो तलाश थी परन्तु हमने इसका चुनाव खुद नहीं किया सिर्फ कल्पना करते  रहे । जिंदगी की भागदौड़ में कभी फुरसत से अपनों के साथ समय भी व्यतीत नहीं किया हम सभी अपने मार्गो से विचलित हो गए । हमने जल ,थल और वायु को दूषित किया परन्तु इसके निवारण के बारे में विचार नहीं किया आज इस कोरोना वायरस के भए से हम सभी सरकार के हर नियमो का पालन कर रहे है | यही पालन अगर हम पहले कर लेते तो शायद पर्यावरण स्वच्छ होता, हवा शुद्ध बहती और जल निर्मल होता । कितना विचित्र है यह की आज पशु ,पक्षी और जानवर भयमुक्त घूम रहे है और हम सभी वायरस के भय से  घरो मैं कैद है | शायद कही ये हमारे कर्मो का फल तो नहीं जो प्रकति ने हमको दिया है ? अभी भी समय है अगर हम संभल जाये और अनुशासन से अपने जीवन को व्यतीत करे । आओ हम सब शपथ लेते है की हम इस प्रकति को फिर से सूंदर, स्वच्छ रखेंगे और एकजुट होकर सरकार के नियमो का पालन करके इस देश को इस महामारी से मुक्त करेंगे |

आपकी 
मीनाक्षी

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